#StoriesofHumanity
इतिहास में कुछ पन्ने ऐसे भी दर्ज हैं जहां इंसानियत को जिंदा रखने के लिए पूरी की पूरी बस्ती ने मौत को गले लगाना स्वीकार कर लिया।
यह कहानी साल 1665 के इंग्लैंड के एक छोटे और शांत गांव इयाम की है। उन दिनों लंदन में प्लेग का भयंकर तांडव चल रहा था। इसी दौरान इयाम गांव के एक स्थानीय दर्जी ने लंदन से कपड़ों का एक पार्सल मंगवाया। दुर्भाग्य से उस नम कपड़े में प्लेग फैलाने वाले पिस्सू छिपे हुए थे। कुछ ही दिनों में वह दर्जी और उसका पूरा परिवार खत्म हो गया। देखते ही देखते महामारी ने पूरे गांव को अपनी गिरफ्त में ले लिया।
संकट के उस दौर में इंसानी फितरत अमूमन यही कहती है कि भागो और अपनी जान बचाओ। लेकिन इयाम के लोगों को यह बखूबी अहसास था कि अगर वे वहां से भागे, तो यह जानलेवा बीमारी आस-पास के तमाम शहरों और हजारों निर्दोष लोगों तक फैल जाएगी। ऐसे में गांव के दो पादरियों, विलियम मोम्पेशन और थॉमस स्टेनली ने ग्रामीणों के सामने एक बेहद कठिन प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि हम सब मिलकर इस गांव को पूरी दुनिया से अलग कर देंगे, यानी न कोई बाहर जाएगा और न कोई अंदर आएगा।
आज के समय में जब छोटी-मोटी पाबंदियों पर भी विवाद खड़े हो जाते हैं, तब उस दौर में इयाम की पूरी कम्युनिटी ने सामूहिक रूप से इस आत्मघाती फैसले पर अपनी रजामंदी दे दी। उन्होंने गांव के चारों तरफ पत्थरों की एक सीमा तय कर दी। पड़ोसी गांव के लोग तय सीमा पर राशन छोड़ जाते थे और संक्रमण न फैले, इसलिए इयाम के लोग पत्थरों के गड्ढों में सिरके के पानी में डूबे हुए सिक्के छोड़ते थे।
चौदह महीनों के उस बंद घेरे के भीतर का मंजर किसी नरक से कम नहीं था। लोग अपनी आंखों के सामने अपने भरे-पूरे परिवार को उजड़ते देख रहे थे। एलिजाबेथ हैनकॉक नाम की एक महिला ने महज आठ दिनों में अपने छह बच्चों और पति को अपने ही हाथों से दफनाया। खुद पादरी मोम्पेशन की पत्नी भी लोगों की सेवा करते-करते संक्रमित हुईं और दुनिया से विदा हो गईं। मगर इस खौफनाक दर्द के बावजूद किसी एक शख्स ने भी सीमा लांघकर भागने की कोशिश नहीं की।
जब यह महामारी खत्म हुई, तो लगभग 350 की आबादी वाले उस गांव के 260 लोग दम तोड़ चुके थे। सत्तर फीसदी से ज्यादा की मृत्यु दर होने के बाद भी उनका यह त्याग सफल रहा क्योंकि प्लेग उस तय सीमा के पार नहीं जा सका और आस-पास के हजारों लोग सुरक्षित बच गए। इयाम गांव की यह ऐतिहासिक दास्तान हमेशा यह याद दिलाती रहेगी कि इतिहास में कुछ पन्ने ऐसे भी दर्ज हैं जहां इंसानियत को जिंदा रखने के लिए पूरी की पूरी बस्ती ने मौत को गले लगाना स्वीकार कर लिया।
#श्रीशउवाच

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