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Episode 4 | Nilotpal Mrinal

बतरस के तीन एपिसोड होने तक पॉडकास्ट करने के बारे में बहुत कुछ पता चला। एक 9 से 5:30 की नौकरी करते हुए ये कत्तई आसान नहीं था। इस वक़्त हम इस मुहाने पे थे कि आगे कंटिन्यू करना है या नहीं। इसमें एक खासा वक़्त लगता है। ख़ुशबू के कहने पर ये तय हुआ कि जब तक कर सकते हैं, करते हैं। भाई नीलोत्पल मृणाल से बात हुई थी पॉडकास्ट के लिए। वे तैयार थे, बस नोएडा में होने और उपयुक्त समय की खोज थी। आख़िर वो समय हमें मिला।  नीलोत्पल मृणाल भाई स्टूडियो आए। हम अपनी पिछली मुलाक़ातों के बारे में बात करने लगे। मैं नीलोत्पल भाई को उनके लेखक होने के खासा पहले से जानता हूँ। जेएनयू और दिल्ली यूनिवर्सिटी के कितने ही सारे कैंपस में कितने ही मंचों पर नीलोत्पल भाई स्वतः स्फूर्त अपनी बात, अपनी कविता कहने को आते और जनता झूम उठती। जेएनयू के किसी मंच पर जबकि मैं एंकरिंग कर रहा था, नीलोत्पल भाई वहाँ भी आए और जनता को रिझा गए।  भाई, खरा सोना है तपा हुआ। इनके लिए राजनीति, नैतिकता, लोकतंत्र, सामाजिकता ये शब्द नहीं हैं, इनकी अर्थवत्ता के लिए वे जान भी दे दें। ये एंग्री यंगमैन मुस्कुराता और हँसता भी है लेकिन इसकी मूल ता...

Episode 3 | Prof. S. D. Muni

गोरखपुर विश्वविद्यालय में ग्रेजुएशन में जब पहले साल मेरा नम्बर बहुत अच्छा आया तो मेरे एक सीनियर राजीव रंजन भैया ने मुझे कहा- इंडिया में अव्वल पढ़ाई करनी है सोशल साइंस में तो जेएनयू में पढ़ना चाहिए। मैंने पहली बार जेएनयू का नाम 2003 में सुना था। जमाना तब मोबाइल का नहीं हुआ था, इंटरनेट होता है, कुछ मेल जैसी चीज होती है, आम लोगों को इतना पता था। जगह-जगह पीसीओ एसटीडी के बूथ होते थे, लैंडलाइन जमाने के बाद वही क्रांतिकारी लगता था।  जिनसे हम ख़ौफ़ खाते थे, वे भी जेएनयू के नाम पर क्या बड़ा चेहरा बनाकर तारीफ़ किया करते थे। मैं भाग्यशाली रहा, जेएनयू ने मुझे अपनाया। जेएनयू में जो प्रोफेसर मिले, वे सभी अनूठे। हर किसी का अपना व्यक्तित्व, सबसे बड़ी बात वे स्टूडेंट्स से बात करने को हरदम तैयार दिखते। मैं दक्षिण एशिया विभाग में विद्यार्थी हुआ तो मेरे विभाग में नामचीन प्रोफेसर्स की लंबी फेहरिस्त थी- प्रो. बिमल प्रसाद, प्रो. उर्मिला फड़नीस, प्रो. कलीम बहादुर, प्रो. मोहम्मद अयूब, प्रो. मुचकुंद दुबे, प्रो. पार्था एस. घोष, प्रो. एस.डी. मुनि, प्रो. सी. राजामोहन, प्रो. महेंद्र पी लामा, प्रो. आई. एन. मुखर्...

Episode 2 | Dinesh Bawra

बतरस का पहला एपिसोड शूट हो गया था।  पोस्ट- शूट ढेरों चीजों को हम समझ ही रहे थे, तब तक दिनेश बावरा भैया का ह्वाट्सऐप पर मैसेज आ गया था कि वे दिल्ली आ रहे हैं और हमारी बातचीत हो जाएगी। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। मैं बावरा भैया से पहली बार मिलने वाला था, हालांकि फ़ोन पर बात कई बार हुई थी। हम सबके आदरणीय अभिषेक शुक्ल निश्छल भैया ने बावरा जी से मेरी बात जब करायी थी तब वह बातें मैंने राजनीति शास्त्र के एक विद्यार्थी के तौर पर की थीं उनसे, सालों पहले।  दिनेश भैया सामाजिक-राजनीतिक तौर पर एक संवेदनशील और जागरूक व्यक्ति हैं। अपना क्षेत्र, अपना समाज पिछड़ा ना कहलाए, युवाओं के आदर्श,  क्षेत्र के गुंडे-मवाली-बदमाश से हटकर वे शानदार लोग हों जो अलग- अलग क्षेत्र में अपना लोहा मनवा रहे हैं, ऐसा वे चाहते रहे हैं। जब मैंने दिनेश बावरा जी से फ़ोन पर पहली बार बात की तो मुझे लगा इतना आदर्श कौन सोचता है, क्या सचमुच होते हैं ऐसे लोग? लोग तो मुझे ही किताबी कह देते हैं, सिर्फ़ इसलिए कि मेरा पेशा है पढ़ाना। यहाँ ये व्यक्ति देखिए देश दुनिया में नाम बनाता, सबको हँसाता-सीखता, क्या मंच क्या टीवी क्या...