बतरस के तीन एपिसोड होने तक पॉडकास्ट करने के बारे में बहुत कुछ पता चला। एक 9 से 5:30 की नौकरी करते हुए ये कत्तई आसान नहीं था। इस वक़्त हम इस मुहाने पे थे कि आगे कंटिन्यू करना है या नहीं। इसमें एक खासा वक़्त लगता है। ख़ुशबू के कहने पर ये तय हुआ कि जब तक कर सकते हैं, करते हैं। भाई नीलोत्पल मृणाल से बात हुई थी पॉडकास्ट के लिए। वे तैयार थे, बस नोएडा में होने और उपयुक्त समय की खोज थी। आख़िर वो समय हमें मिला।
नीलोत्पल मृणाल भाई स्टूडियो आए। हम अपनी पिछली मुलाक़ातों के बारे में बात करने लगे। मैं नीलोत्पल भाई को उनके लेखक होने के खासा पहले से जानता हूँ। जेएनयू और दिल्ली यूनिवर्सिटी के कितने ही सारे कैंपस में कितने ही मंचों पर नीलोत्पल भाई स्वतः स्फूर्त अपनी बात, अपनी कविता कहने को आते और जनता झूम उठती। जेएनयू के किसी मंच पर जबकि मैं एंकरिंग कर रहा था, नीलोत्पल भाई वहाँ भी आए और जनता को रिझा गए।
भाई, खरा सोना है तपा हुआ। इनके लिए राजनीति, नैतिकता, लोकतंत्र, सामाजिकता ये शब्द नहीं हैं, इनकी अर्थवत्ता के लिए वे जान भी दे दें। ये एंग्री यंगमैन मुस्कुराता और हँसता भी है लेकिन इसकी मूल तासीर नहीं बदलती। पॉडकास्ट शूट के पहले एक पुराने मित्र की भाँति हमने निजी जीवन की बातें भी साझा कीं, मैंने महसूस किया कि कोई इतना संवेदनशील, ईमानदार और जीवट एक साथ कैसे हो सकता है! भाई ऐसे ही हैं।
पॉडकास्ट में हमने खूब बातें कीं। भाई, का ये कमेंट यादगार रहा- “श्रीश भाई! पॉडकास्ट एक नए तरह का चरस है आजकल, इसमें पूछने वाले तो बच जाते हैं लेकिन उत्तर देने वालों पर मस्ती में टाइपकास्ट होने का खतरा रहता है।”
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