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260 of 350 Died, But They Saved Thouands!

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#StoriesofHumanity इतिहास में कुछ पन्ने ऐसे भी दर्ज हैं जहां इंसानियत को जिंदा रखने के लिए पूरी की पूरी बस्ती ने मौत को गले लगाना स्वीकार कर लिया। यह कहानी साल 1665 के इंग्लैंड के एक छोटे और शांत गांव इयाम की है। उन दिनों लंदन में प्लेग का भयंकर तांडव चल रहा था। इसी दौरान इयाम गांव के एक स्थानीय दर्जी ने लंदन से कपड़ों का एक पार्सल मंगवाया। दुर्भाग्य से उस नम कपड़े में प्लेग फैलाने वाले पिस्सू छिपे हुए थे। कुछ ही दिनों में वह दर्जी और उसका पूरा परिवार खत्म हो गया। देखते ही देखते महामारी ने पूरे गांव को अपनी गिरफ्त में ले लिया। संकट के उस दौर में इंसानी फितरत अमूमन यही कहती है कि भागो और अपनी जान बचाओ। लेकिन इयाम के लोगों को यह बखूबी अहसास था कि अगर वे वहां से भागे, तो यह जानलेवा बीमारी आस-पास के तमाम शहरों और हजारों निर्दोष लोगों तक फैल जाएगी। ऐसे में गांव के दो पादरियों, विलियम मोम्पेशन और थॉमस स्टेनली ने ग्रामीणों के सामने एक बेहद कठिन प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि हम सब मिलकर इस गांव को पूरी दुनिया से अलग कर देंगे, यानी न कोई बाहर जाएगा और न कोई अंदर आएगा। आज के समय में जब छोटी-मोट...

Episode 4 | Nilotpal Mrinal

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बतरस के तीन एपिसोड होने तक पॉडकास्ट करने के बारे में बहुत कुछ पता चला। एक 9 से 5:30 की नौकरी करते हुए ये कत्तई आसान नहीं था। इस वक़्त हम इस मुहाने पे थे कि आगे कंटिन्यू करना है या नहीं। इसमें एक खासा वक़्त लगता है। ख़ुशबू के कहने पर ये तय हुआ कि जब तक कर सकते हैं, करते हैं। भाई नीलोत्पल मृणाल से बात हुई थी पॉडकास्ट के लिए। वे तैयार थे, बस नोएडा में होने और उपयुक्त समय की खोज थी। आख़िर वो समय हमें मिला।  नीलोत्पल मृणाल भाई स्टूडियो आए। हम अपनी पिछली मुलाक़ातों के बारे में बात करने लगे। मैं नीलोत्पल भाई को उनके लेखक होने के खासा पहले से जानता हूँ। जेएनयू और दिल्ली यूनिवर्सिटी के कितने ही सारे कैंपस में कितने ही मंचों पर नीलोत्पल भाई स्वतः स्फूर्त अपनी बात, अपनी कविता कहने को आते और जनता झूम उठती। जेएनयू के किसी मंच पर जबकि मैं एंकरिंग कर रहा था, नीलोत्पल भाई वहाँ भी आए और जनता को रिझा गए।  भाई, खरा सोना है तपा हुआ। इनके लिए राजनीति, नैतिकता, लोकतंत्र, सामाजिकता ये शब्द नहीं हैं, इनकी अर्थवत्ता के लिए वे जान भी दे दें। ये एंग्री यंगमैन मुस्कुराता और हँसता भी है लेकिन इसकी मूल ता...

Episode 3 | Prof. S. D. Muni

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गोरखपुर विश्वविद्यालय में ग्रेजुएशन में जब पहले साल मेरा नम्बर बहुत अच्छा आया तो मेरे एक सीनियर राजीव रंजन भैया ने मुझे कहा- इंडिया में अव्वल पढ़ाई करनी है सोशल साइंस में तो जेएनयू में पढ़ना चाहिए। मैंने पहली बार जेएनयू का नाम 2003 में सुना था। जमाना तब मोबाइल का नहीं हुआ था, इंटरनेट होता है, कुछ मेल जैसी चीज होती है, आम लोगों को इतना पता था। जगह-जगह पीसीओ एसटीडी के बूथ होते थे, लैंडलाइन जमाने के बाद वही क्रांतिकारी लगता था।  जिनसे हम ख़ौफ़ खाते थे, वे भी जेएनयू के नाम पर क्या बड़ा चेहरा बनाकर तारीफ़ किया करते थे। मैं भाग्यशाली रहा, जेएनयू ने मुझे अपनाया। जेएनयू में जो प्रोफेसर मिले, वे सभी अनूठे। हर किसी का अपना व्यक्तित्व, सबसे बड़ी बात वे स्टूडेंट्स से बात करने को हरदम तैयार दिखते। मैं दक्षिण एशिया विभाग में विद्यार्थी हुआ तो मेरे विभाग में नामचीन प्रोफेसर्स की लंबी फेहरिस्त थी- प्रो. बिमल प्रसाद, प्रो. उर्मिला फड़नीस, प्रो. कलीम बहादुर, प्रो. मोहम्मद अयूब, प्रो. मुचकुंद दुबे, प्रो. पार्था एस. घोष, प्रो. एस.डी. मुनि, प्रो. सी. राजामोहन, प्रो. महेंद्र पी लामा, प्रो. आई. एन. मुखर्...

Episode 2 | Dinesh Bawra

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बतरस का पहला एपिसोड शूट हो गया था।  पोस्ट- शूट ढेरों चीजों को हम समझ ही रहे थे, तब तक दिनेश बावरा भैया का ह्वाट्सऐप पर मैसेज आ गया था कि वे दिल्ली आ रहे हैं और हमारी बातचीत हो जाएगी। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। मैं बावरा भैया से पहली बार मिलने वाला था, हालांकि फ़ोन पर बात कई बार हुई थी। हम सबके आदरणीय अभिषेक शुक्ल निश्छल भैया ने बावरा जी से मेरी बात जब करायी थी तब वह बातें मैंने राजनीति शास्त्र के एक विद्यार्थी के तौर पर की थीं उनसे, सालों पहले।  दिनेश भैया सामाजिक-राजनीतिक तौर पर एक संवेदनशील और जागरूक व्यक्ति हैं। अपना क्षेत्र, अपना समाज पिछड़ा ना कहलाए, युवाओं के आदर्श,  क्षेत्र के गुंडे-मवाली-बदमाश से हटकर वे शानदार लोग हों जो अलग- अलग क्षेत्र में अपना लोहा मनवा रहे हैं, ऐसा वे चाहते रहे हैं। जब मैंने दिनेश बावरा जी से फ़ोन पर पहली बार बात की तो मुझे लगा इतना आदर्श कौन सोचता है, क्या सचमुच होते हैं ऐसे लोग? लोग तो मुझे ही किताबी कह देते हैं, सिर्फ़ इसलिए कि मेरा पेशा है पढ़ाना। यहाँ ये व्यक्ति देखिए देश दुनिया में नाम बनाता, सबको हँसाता-सीखता, क्या मंच क्या टीवी क्या...

Blog_BatRas l Episode 01 l Dr. Anurag Arya

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Home Page अब ये जानना अजीब लगेगा लेकिन कहना पड़ेगा कि जब मै सांतवीं या आठवीं क्लास में रहा होगा तो अपनी गोदी में छोटे भाई को लिए हुए मुहल्ले में इधर-उधर घूमता रहता था। बाकी दोस्त क्रिकेट खेलते थे, मै नहीं खेल सकता था क्योंकि दो छोटे भाई और एक बहन थी, जिन्हें सम्हालना होता था और मम्मी को घर के काम भी निपटाने होते थे। उस समय खेल-खेल में सवाल पूछने का खेल भी खेलते थे, और मेरे सवाल सबको बड़े पसंद आते थे। इसका एक आनंद आता था, लगा कि इसमें एक तरह की स्मार्टनेस चाहिए होती है। अब बतरस पॉडकास्ट में मेरा काम ही यही है। पहले एपिसोड की बताऊँ तो मै कोई बहुत कॉन्फिडेंट नहीं था। गेस्ट हमने शानदार चुन लिया था, दो लिहाज से- पहला तो वे मेरे पुराने दोस्त हैं, अनुराग आर्या जी के साथ एक स्पिरिचुअल कम्फर्ट था; दूसरे शानदार व्यक्ति के साथ ही वे बड़े ज़हीन और उम्दा लेखक हैं। तो ये तो समझ आ रहा था कि गेस्ट सपोर्टिव हैं, कुछ ऊँच-नीच हुई हमारी तैयारियों में तो सम्हल जाएगा। दूर से पॉडकास्ट जब हम देखते हैं तो लगता है, बस दो माइक, दो सोफ़ा, सवाल और जवाब, बस यही तो है पॉडकास्ट। हमें अब अंदाजा लग रहा था कि हमने किसी अननोन...

Clips-BatRas01 l Ishq Ka Koi Formula Nahi Hota... ❤️

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