जिनसे हम ख़ौफ़ खाते थे, वे भी जेएनयू के नाम पर क्या बड़ा चेहरा बनाकर तारीफ़ किया करते थे। मैं भाग्यशाली रहा, जेएनयू ने मुझे अपनाया। जेएनयू में जो प्रोफेसर मिले, वे सभी अनूठे। हर किसी का अपना व्यक्तित्व, सबसे बड़ी बात वे स्टूडेंट्स से बात करने को हरदम तैयार दिखते। मैं दक्षिण एशिया विभाग में विद्यार्थी हुआ तो मेरे विभाग में नामचीन प्रोफेसर्स की लंबी फेहरिस्त थी- प्रो. बिमल प्रसाद, प्रो. उर्मिला फड़नीस, प्रो. कलीम बहादुर, प्रो. मोहम्मद अयूब, प्रो. मुचकुंद दुबे, प्रो. पार्था एस. घोष, प्रो. एस.डी. मुनि, प्रो. सी. राजामोहन, प्रो. महेंद्र पी लामा, प्रो. आई. एन. मुखर्जी और भी बहुत सारे। इस विभाग को जेएनयू में सारे जानते थे।
प्रो. एस. डी. मुनि को सुनने समझने का मुझे ज़्यादा समय मिला। मुनि सर की भाषा बड़ी ही सुघड़, क्या इंग्लिश क्या हिंदी, उसपर से वो क्लैरिटी और सही को कहने की हिम्मत, ये उन्हें अलग बनाती थी। मैंने अलग-अलग समय के लगभग दक्षिण एशिया के सभी राजदूतों को उनकी मुक्तकंठ से प्रशंसा करते सुना है। प्रोफसर के अलावा वे चूँकि स्वयं भी राजदूत रहे थे तो उनका कहा केवल सैद्धांतिक नहीं होता था, उसमें व्यावहारिकता भी झलकती थी। जहाँ किसी सेमिनार में उनका मुख्य संबोधन नहीं होता, वे एक विधार्थी की तरह सुनते; फिर सभी के आग्रह पर जब वे बोलते तो सबकी कलम अपनी-अपनी डायरी पर चल पड़ती।
बतरस में उनसे बात करने का मन था। पॉडकास्ट किसी फॉर्मल इंटरव्यू की तरह तो होता नहीं, और मैंने मुनि सर को विश्व राजनीति के अलावा कभी कुछ और बोलते सुना भी नहीं था। पॉडकास्ट में तो उनके जीवन पर भी बात होती, पता नहीं वे कितने सहज होंगे। मैं स्वयं भी उनसे कैसे ही कुछ पूछ सकता हूँ, ख़ासकर अगर वो दक्षिण एशिया के विषय से इतर हो। फिर वे मेरे गुरु के गुरु भी हैं। मेरी पीएचडी सुपरवाइजर स्व. प्रो. सविता पांडे के वे गाइड रहे हैं। तो एक हिचक ये भी थी।
मैंने मुनि सर से संपर्क साधा, बस उन्होंने इतना कहा- आपका स्टूडियो दूर है मेरे घर से। लेकिन वे मान गए। वे आए, शूट के दिन बारिश हो रही थी। जिंदगी कड़े इम्तिहान लेती है। वो दिन मैं कभी भूल नहीं सकता, कुछ भावनात्मक चुनौती थी और मैं बिल्कुल इस स्थिति में स्वयं को नहीं पा रहा था, कि मैं किसी से भी कुछ पूछ सकूँ; और यहाँ तो प्रो. मुनि से बात करनी थी!
सर से बातचीत करने के लिए मैंने थोड़ी तैयारी पहले की जरूर थी, लेकिन मानो मैं अपने नियंत्रण में नहीं था। शूट शुरू हुआ, मैंने उनका पूरा नाम ही ग़लत पुकारा। पहले पाँच मिनट जब गुज़र गए, फिर मेरे लिए बाक़ी दुनिया एक्जिस्ट नहीं करती थी, फिर मैं सहज हो गया था। पहली बार प्रो. एसडी मुनि अपने बचपन की बातें बता रहे थे, उन्होंने जेएनयू में उनका सिलेक्शन कैसे हुआ- बेबाकी से बताया। एक प्रोफेसर जब अचानक कूटनीति की दुनिया में पहुंचता है तो उसका स्वागत कैसे होता है? प्रधानमंत्री आई के गुजराल का उनपर जो फेथ था, वो कैसे पनपा- बहुत कुछ बात की फिर हमने। दक्षिण एशिया के तो सर एक्सपर्ट ही हैं, फिर हमने हर देश के बारे में बात की। भूटान, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश के तो जाने ही कितने राजनीतिक रसूखदारों से उनका निकट का संबंध रहा है, ऐसी कितनी ही बातें उन्होंने साझा कीं।
किताबों, क्लासरूम्स और सेमिनारों में दुनिया की राजनीति को समझना और मुनि सर जो कि ख़ुद दक्षिण एशियाई राजनीति की एक विमा रहे उनसे उन किस्सों को सुनना, एक अद्भुत अनुभव से गुजरना रहा। यह अद्भुत अनुभव ज्यों का त्यों बतरस के तीसरे एपिसोड में संजोया है, आप भी देखें-सुनें।
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